गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य पाने के लिए मुकम्मल कार्ययोजना आवश्यक मान रहे हैं निशिकान्त ठाकुर शिक्षा का संकट देश के तमाम सुदूर पिछड़े इलाकों में शिक्षा की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही स्थिति मानकों के अनुरूप नहीं है। हालत यह है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या तो लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन स्कूलों की संख्या में किसी बढ़ोतरी के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। जो स्कूल हैं, उनमें भी शिक्षकों की भारी कमी है। ऐसी स्थिति में जबकि न तो सबके लिए स्कूल हैं और न स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक ही हैं, शिक्षा की व्यवस्था कैसे चल रही है, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है।
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Tuesday, May 8, 2012
Friday, April 27, 2012
नीतियों में नियोजन जरूरी (editorial)
हरियाणा स्कूल शिक्षा बोर्ड की नीतियों की लचरता के कारण प्रश्नपत्रों के मूल्यांकन का काम बाधित हुआ और इसका असर दस जमा दो वार्षिक परीक्षा के परिणाम की घोषणा में विलंब के रूप में सामने आ सकता है। इसमें संदेह नहीं कि ऐन वक्त पर मूल्यांकन केंद्रों की वीडियोग्राफी के बोर्ड के आदेश से इस कार्य में लगे अध्यापकों के स्वाभिमान को ठेस लगी और स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तौर पर उन्होंने मूल्यांकन कार्य का बहिष्कार कर दिया। संगठित विरोध के स्वर तेज होने पर शिक्षा बोर्ड को झुकना पड़ा और वीडियोग्राफी का आदेश वापस लेना पड़ा। इस प्रक्रिया में समय तो बर्बाद हुआ जिसका असर बोर्ड के आगामी कार्यक्रम के निर्धारण पर पड़ने जा रहा है।
Tuesday, April 17, 2012
योजना बाधित न हो( NEWS EDITORIAL )
योजना बाधित न हो हरियाणा में लिंग अनुपात के साथ कन्या शिक्षा की स्थिति भी बेहतर नहीं है। ड्रॉप आउट में अधिकतम संख्या कन्याओं की ही है। पांचवीं तक तो स्थिति कुछ संतोषजनक रहती है परंतु उसके बाद जैसे-जैसे कक्षा बढ़ती है, लड़कियों की संख्या घटती जाती है। हालांकि प्रदेश सरकार ने अनेक योजनाएं शुरू करके इस विसंगति एवं विडंबना को दूर करने की कोशिश की है