अध्यापक भर्ती प्रक्रिया को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इंसाफ के लिए प्रधानमंत्री को पत्र भेजा गया है। इसमें समानता के अधिकार की रक्षा करने की गुहार लगाई गई है। यह पत्र खटकड़ गांव के पूर्व सैनिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश कु मार द्वारा भेजा गया है। अपने पत्र में सुरेश कु मार ने कहा है कि सरकार जिस ढर्रे पर चलकर अध्यापकों की भर्ती की कवायद में जुटी है, वह पूरी तरह से नाजायज है और निरर्थक है। सरकार ने 2006 व 2007 में गैस्ट टीचरों की भर्ती की थी, वह सरासर संविधान का उल्लंघन था। गेस्ट टीचरों की भर्ती में न तो आरक्षण का प्रावधान किया गया था और न ही कोई विज्ञापन जारी किया गया था। एक भी एक्ससर्विसमैन को प्रदेश में अध्यापक नहीं लगाया गया। इस दौरान न तो कोई विज्ञापन ही निकाला गया और खुद के गांव में आवेदन करने की शर्त लगाई गई। यह संविधान में दिए गए समानता के अधिकार उल्लंघन था। सरकार द्वारा नौकरी के मामले में सरेआम भेदभाव बरता गया और बराबरी का हक छीना गया।
इसी सरकार ने सबसे पहले पात्रता परीक्षा लागू की थी और उस वक्त देश में और कहीं पर भी ऐसी परीक्षा नहीं ली जाती थी। लेकिन अब पलटी मारते हुए इसी सरकार ने पात्रता परीक्षा को धता बता दिया और चार साल के अनुभव के आधार पर छूट दे दी, जबकि पूरे देश में पात्रता परीक्षा की शर्त लागू की गई है। पात्रता परीक्षा से छूट को हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक नामंजूर कर चुका है। इसके बावजूद सरकार गेस्ट टीचरों को छूट देने पर आमादा है।
इसी सरकार ने सबसे पहले पात्रता परीक्षा लागू की थी और उस वक्त देश में और कहीं पर भी ऐसी परीक्षा नहीं ली जाती थी। लेकिन अब पलटी मारते हुए इसी सरकार ने पात्रता परीक्षा को धता बता दिया और चार साल के अनुभव के आधार पर छूट दे दी, जबकि पूरे देश में पात्रता परीक्षा की शर्त लागू की गई है। पात्रता परीक्षा से छूट को हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक नामंजूर कर चुका है। इसके बावजूद सरकार गेस्ट टीचरों को छूट देने पर आमादा है।
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